[50+] Insaniyat Shayari in Hindi (NOV 2021) | इंसानियत शायरी

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Insaniyat Shayari


Insaniyat Shayari
Sad Insaniyat Shayari Hindi

आइना कोई ऐसा बना दे, ऐ खुदा जो,
इंसान का चेहरा नहीं किरदार दिखा दे..!!

पहले ज़मीं बँटी फिर घर भी बँट गया,
इंसान अपने आप में कितना सिमट गया..!!

प्यार की चाँदनी में खिलते हैं,
दश्त-ए-इंसानियत के फूल हैं हम..!!

हमारी आरजूओं ने हमें इंसान बना डाला,
वर्ना जब जहान में आये थे बन्दे थे खुदा के..!!

इंसानियत का पुजारी था मैं,
इंसानों को परख नहीं पाया मैं,
अफसोस तो इसी बात का हैं,
इंसानों को परख नहीं पाया मैं..!!

न हम अच्छे न तुम अच्छे रहा कोई न अब अच्छा,
मगर अच्छा रहे हम-तुम अगर अच्छाइयाँ सीखें..!!

दौलत की चमक ये तेरी बीनाई न लूटे,
गुज़रे जो मुद्दई कोई तो दरगुज़र न हो..!!

आदमी का आदमी हर हाल में हमदर्द हो,
इक तवज्जोह चाहिए इंसाँ को इंसाँ की तरफ़..!!

मेरी जबान के मौसम बदलते रहते हैं,
मैं तो आदमी हूँ मेरा ऐतबार मत करना..!!

यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं,
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे..!!


Insaniyat Shayari in Hindi


Insaniyat Shayari in Hindi
Insaniyat Shayari in Hindi

फितरत सोच और हालात में फर्क है वरना,
इन्सान कैसा भी हो दिल का बुरा नहीं होता..!!

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं,
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद..!!

​​हमारी आरजूओं ने हमें इंसान बना डाला​,
​वरना जब जहां में आये थे बन्दे ​​​थे खुदा के​..!!

हम खुदा थे गर न होता दिल में कोई मुद्दा,
आरजूओं ने हमारी हमको बंदा कर दिया..!!

दिल के मंदिरों में कहीं बंदगी नहीं करते,
पत्थर की इमारतों में खुदा ढूंढ़ते हैं लोग..!!

जिन्हें महसूस इंसानों के रंजो-गम नहीं होते,
वो इंसान भी हरगिज पत्थरों से कम नहीं होते..!!

चंद सिक्कों में बिकता है यहाँ इंसान का ज़मीर,
कौन कहता है मेरे मुल्क में महंगाई बहुत है..!!

ढूंढ़ने से तो बशर को खुदा भी मिलता है,
खुदा अगर ढूंढे तो इंसान कहाँ मिलता है..!!

ज़मीर जाग ही जाता है अगर ज़िन्दा हो इक़बाल,
कभी गुनाह से पहले तो कभी गुनाह के बाद..!!

ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़
डरते हैं ऐ ज़मीन तिरे आदमी से हम..!!


Shayari on Insaniyat


Insaniyat Shayari Hindi
Shayari on Insaniyat

खुदा तो मिलता है पर इंसान ही नहीं मिलता,
ये चीज़ वो है जो देखी कहीं कहीं मैंने..!!

बहुत हैं सज्दा-गाहें पर दर-ए-जानाँ नहीं मिलता,
हज़ारों देवता हैं हर तरफ़ इंसाँ नहीं मिलता..!!

इस दौर में इंसान का चेहरा नहीं मिलता,
कब से मैं नक़ाबों की तहें खोल रहा हूँ..!!

इंसानियत तो मैंने आज ब्लड बैंक में देखी थी,
खून की बोतलों पर मजहब लिखा नही होता..!!

बेदिली को चलो दिलों से निकाला जाए,
फिर किसी खवाब को पलकों में संभाला जाए..!!

कितनी मुर्दादिल हो गई है ज़िन्दगी सबकी,
नातवानों की दिल में फ़िक्र को डाला जाए..!!

जिस्म की सारी रगें तो स्याह खून से भर गयी हैं,
फक्र से कहते हैं फिर भी हम कि हम इंसान हैं..!!

हम खुदा थे गर न होता दिल में कोई मुद्दा,
आरजूओं ने हमारी हमको बंदा कर दिया..!!

इन्सानियत की रौशनी गुम हो गई कहाँ,
साए तो हैं आदमी के मगर आदमी कहाँ..!!

देखें करीब से तो भी अच्छा दिखाई दे,
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे..!!


Sad Insaniyat Par Shayari


इंसानियत शायरी
Insaniyat Par Shayari

बुरा बुरे के अलावा भला भी होता है,
हर आदमी में कोई दूसरा भी होता है..!!

आओ अपनी ज़रूरतों को मुख़तसर कर लें,
कोई रूखा सही पर उन तक निवाला जाए..!!

आग नफ़रत की झोपड़ों को जला डालेगी,
रख मोहब्बत की शमा दिल तक उजाला जाए..!!

बन गए हैं क्या पलके हिंदू और मुसलमाँ हम,
अब से बच्चों में सिर्फ़ इंसाँ को ही पाला जाए..!!

आसमाँ में भी इक सुराख़ हो ही जाएगा,
बारहा पत्थर तबीयत से उछाला जाए..!!

मेरी जबान के मौसम बदलते रहते हैं,
मैं तो आदमी हूँ मेरा ऐतबार मत करना..!!

खुदा न बदल सका आदमी को आज भी यारों,
और आदमी ने सैकड़ो खुदा बदल डाले..!!

हर आदमी होते हैं दस बीस आदमी,
जिसको भी देखना कई बार देखना..!!

इल्म-ओ-अदब के सारे खजाने गुजर गए,
क्या खूब थे वो लोग पुराने गुजर गए,
बाकी है बस जमीं पे आदमी की भीड़,
इंसान को मरे हुए तो ज़माने गुजर गए..!!

दिल के मंदिरों में कहीं बंदगी नहीं करते,
पत्थर की इमारतों में खुदा ढूंढ़ते हैं लोग..!!


Best Insaniyat Shayari Image


इंसानियत शायरी हिंदी
Best Insaniyat Shayari Image

हमारी आरजूओं ने हमें इंसान बना डाला​,
​वरना जब जहां में आये थे बन्दे ​​​थे खुदा के​..!!

मज़हबी बहस मैंने की ही नहीं,
फ़ालतू अक़्ल मुझमें थी ही नहीं..!!

जिन्हें महसूस इंसानों के रंजो-गम नहीं होते,
वो इंसान भी हरगिज पत्थरों से कम नहीं होते..!!

फितरत सोच और हालात में फर्क है वरना,
इन्सान कैसा भी हो दिल का बुरा नहीं होता..!!

इंसानियत कभी नहीं मरती,
मानव के अंदर का वो इंसान ही मर जाता हैं,
जो इंसानियत को कायम रखता हैं..!!

कभी अनजान नहीं बना मैं,
पर दुनिया को ज्यादा जान नहीं पाया मैं,
पढ़ा तो मैंने भी बहुत कुछ था,
ज्यादा कुछ समझ नहीं पाया मैं..!!

मेरी जबान के मौसम बदलते रहते हैं,
मैं तो आदमी हूँ मेरा ऐतबार मत करना..!!

ऊपरवाले तेरे से कोई शिकवा नहीं होता,
अगर जिंदगी में एक बार मजहब के झण्डों की जगह,
इंसानियत का झण्डा लहराता देख लेता..!!

आइना कोई ऐसा बना दे ऐ खुदा जो,
इंसान का चेहरा नहीं किरदार दिखा दे..!!

नई मंज़िल नया जादू उजाला ही उजाला,
दूर तक इंसानियत का बोल-बाला..!!


Final Words


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